मंगलवार, 16 जून 2009

आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं --

क्या कहा?

आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं

वे शहर लूटने के मनसूबे बना रहे हैं

पर वे तो अभी बहुत दूर हैं

मेरे बाजुओं पर यकीन करो

उनके मनसूबे मैं चूर-चूर कर दूँगा

मुँह-हाथ मैं ज़रा धोने जा रहा हूँ

बहुत थका हूँ

मैं ज़रा सोने जा रहा हूँ।

हालात पर तुम नज़र रखना ----

.

क्या कहा?

आततायी शहर मैं हैं

वे लूट रहे हैं अस्मत

शहर को वो टुकड़ो में बांट रहे हैं

निर्दोषों अबोधों को वे काट रहे हैं

ठहरो, जीत की मैं आधार रख दूँ

मैं अपनी तलवार पर ज़रा धार रख दूँ

अपनी मैं गोटियाँ सजा लूँ

भूखा हूँ

दो चार मैं रोटियां खा लूँ

मैं अभी आता हूँ

हालात पर तुम नज़र रखना ----

.

क्या कहा

आततायी लूट के जा चुके हैं

बेहिसाब ज़ुल्म ढा चुके हैं

मुझे इस शहर से बहुत प्यार है

यह मेरे अस्तित्व का आधार है

मेरी तलवार अब तैयार है

देखते नहीं इसमे अब कितनी धार है

अगली बार मैं ऐसा होने नहीं दूँगा

इस शहर का सुख चैन खोने नहीं दूँगा

जब वे दुबारा आयें

मुझे ख़बर करना

तलवार मैं सिरहाने रखकर

सोने जा रहा हूँ

हालात पर तुम नज़र रखना ----

14 टिप्‍पणियां:

Urmi ने कहा…

बेहतरीन कविता के लिए बहुत बहुत बधाई! आपकी कविता में एक अपनापन सा लगता है और आप जो भी कविता लिखते हैं दिल की गहराई से लिखते है और बहुत ही सरल भाषा में जो मुझे बेहद पसंद है!

श्यामल सुमन ने कहा…

व्यंग्य की तलवार में धार तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है वर्मा साहब। अच्छी लगी रचना।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

Yogesh Verma Swapn ने कहा…

wah vermaji, aaj ki police bhi to yahi karti hai, aapne sahi vyangya shabd chitra darshaya hai.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

वर्मा साहब।
आपकी कविता मन में आशा और उत्साह का संचार करती है।

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

वर्मा साहब,

पूरे हालातों का सच बयाँ करती कविता कहीं न कहीं अपनी बात सी लगती है। वर्तमान दौर में चिंता, कर्तव्यविमूढता और रजनैतिक प्रयासों का उपहास शब्दों में ढल कब कविता बन जाता है :-

मुझे इस शहर से बहुत प्यार है
यह मेरे अस्तित्व का आधार है
मेरी तलवार अब तैयार है
देखते नहीं इसमे अब कितनी धार है
अगली बार मैं ऐसा होने नहीं दूँगा
इस शहर का सुख चैन खोने नहीं दूँगा
जब वे दुबारा आयें
मुझे ख़बर करना तलवार
मैं सिरहाने रखकर सोने जा रहा हूँ
हालात पर तुम नज़र रखना

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Science Bloggers Association ने कहा…

यह हालात सभी जगहों के हैं। मौका मिलते ही वे निकलते हैं और अपना काम करके चलते बनते हैं।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

ओम आर्य ने कहा…

aapki kawita bhawanao me urajaa paida karati hai .......bahut sundar

वर्तिका ने कहा…

bahut sa-shakt... nayaapan liye hue... saadh kar vaar kar rahi hai aapki kalam...

aabhar

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वाह....बेमिसाल.....लाजवाब.....!!

नमन आपको .....!!

Sajal Ehsaas ने कहा…

s kadar aapne haalato ko bayaa kar diya ki bas...itni intelligent rachna padne ka saubhaagy prapt huaa hai...tareef k liye shabd kam pad rahe hai par dil kar raha hai ki likhta jaaon..bahut achha likha hai aapne :)

!!अक्षय-मन!! ने कहा…

बहुत ही खूब......एक सकारत्मक सोच के साथ लिखी हुई भावात्मक रचना.....
सच्चाई का एक रूप ये भी है......

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

bahut khoob....!

Unknown ने कहा…

Its rare to find a hindi blogger who is good too. Keep posting sir. i loved the word play too. Well said.

Ca Vijay ने कहा…

vyavastha par tikhi dhar wali kavita ke liye badhai.
Ca Vijay kumar Sharma
Varanasi
vks3@rediffmail.com